ISSN: 2456–4397 RNI No.  UPBIL/2016/68067 VOL.- IX , ISSUE- IX December  - 2024
Anthology The Research

घनानंद रीतिमुक्त धारा के अनुपम कवि

Ghanananda A Unique Poet of The Ritimukt Stream
Paper Id :  19513   Submission Date :  2024-12-11   Acceptance Date :  2024-12-24   Publication Date :  2024-12-25
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DOI:10.5281/zenodo.14584684
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कृष्ण कुमार गुप्ता
प्राचार्य
महारानी महिला महाविद्यालय
धौलपुर
राजस्थान,भारत
सारांश

रस, अलंकार, गुण, ध्वनि और नायिका भेद आदि काव्यांगों के विवेचन करते हुए, इनके लक्षण बताते हुए रचे गए काव्य की प्रधानता के कारण इस काल को रीतिकाल कहा गया । रीतिग्रंथों, रीतिकाव्यों तथा अन्य प्रवृत्तियों के कवियों की रचनाओं में भी श्रृंगार रस की प्रधानता के कारण इस काल को श्रृंगारकाल भी कहा जाता है। रीतिकाल में अनेकों कवि हुए जैसे-बिहारी ,भूषण ,मतिराम ,जगन्नाथ दास रत्नाकर, द्विज देव, घनानन्द ,केशवदास, चिन्तामणि, ग्वाल कवि, भिखारी दास बोधा, आलम, कुलपति मिश्रआदि। इनमें से घनानंद का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, घनानंद रीतिकाल में रीतिमुक्तकाव्य धारा के  श्रेष्ठ कवि थे। कवि घनानंद दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के मीर मुंशी थे। बादशाह मुहम्मद शाह के दरबार की सुजान नाम की एक नर्तकी से उनका अटूट प्रेम था। घनानंद ने हिंदी साहित्य को प्रेम की वेदना से युक्त विभिन्न रचनाएँ प्रदान की हैं क्योंकि वह अपनी प्रेयसी सुजान के कारण वेदना से भरे हुए थे। घनानंद विरह जन्य प्रेम के पीर तथा अमर गायक माने जाते हैं।

भक्ति परख रचनाओं में घनानंद ने श्री कृष्ण को 'सुजान' शब्द से सम्बोधित किया है जो इस तथ्य की पुष्टि  करता है कि वह सुजान से आत्मिक प्रेम करते थे और उनको ईश्वर के समतुल्य मानते थे। उनकी रचनाओं में उनके हृदयस्पर्शी वेदना का चित्र साक्षात् दिखाई देता है। घनानंद को साहित्य और संगीत दोनों में महारथ हांसिल थी। घनानंद की मृत्यु 1739 में नादिरशाह के द्वारा किए गए कत्लेआम से हुई थी।

द्वितीयक तथ्यों के आधारपर लिखित इस शोध अध्ययन के अंतर्गत लेखक द्वारा घनानंद के काव्य की विशेषताओं के उल्लेख के साथ-साथ घनानंद को रीतिकाल के अनुपम कवि के रूप में दर्शाया गया है

सारांश का अंग्रेज़ी अनुवाद This period was called the Ritikal period due to the predominance of poetry written while discussing the elements of poetry like rasa, alankar, gun, dhwani and heroine types and describing their characteristics. This period is also called the Shringarkal period due to the predominance of Shringar rasa in the compositions of poets of other trends, including Ritikanthas, Ritikavyas and other trends. There were many poets in the Ritikal period like Bihari, Bhushan, Matiram, Jagannath Das Ratnakar, Dwij Dev, Ghananand, Keshavdas, Chintamani, Gwal Kavi, Bhikhari Das Bodha, Alam, Kulpati Mishra etc. Among these, the name of Ghananand is especially noteworthy.
According to Acharya Ramchandra Shukla, Ghananand was the best poet of the Ritimuktkavya stream in the Ritikal period. Poet Ghananand was the Mir Munshi of the Delhi emperor Muhammad Shah. He was in deep love with a dancer named Sujan in the court of emperor Muhammad Shah. Ghanananda has given various compositions to Hindi literature which are full of the pain of love because he was filled with pain due to his beloved Sujan. Ghanananda is considered to be the immortal singer and the pain of separation.
In his Bhakti Parikh compositions, Ghanananda has addressed Shri Krishna with the word 'Sujan' which confirms the fact that he loved Sujan spiritually and considered him equal to God. The picture of his heart-touching pain is clearly visible in his compositions. Ghanananda was an expert in both literature and music. Ghanananda died in 1739 due to the massacre done by Nadirshah.
In this research study written on the basis of secondary facts, the author has mentioned the characteristics of Ghanananda's poetry and has also depicted Ghanananda as a unique poet of the Ritikaal period.
मुख्य शब्द घनानंद, विरह, प्रेम, सूक्ष्म, भाव, कवि, काव्य, नायिका, करुणा, चित्रण
मुख्य शब्द का अंग्रेज़ी अनुवाद Ghanananda, separation, love, subtle, emotion, poet, poetry, heroine, compassion, depiction
प्रस्तावना

हिंदी साहित्य के इतिहास  के  प्रमुख चार भाग हैं - (1) आदिकाल (2) भक्तिकाल (3) रीतिकाल और (4) आधुनिककाल। साहित्य समाज का दर्पण होता है और तत्कालीन समय और स्थान विशेष की सामाजिक-राजनैतिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। अतः किसी काव्य विशेष का अध्ययन करते समय हमें तत्कालीन परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए। रीतिकाल की समयसीमा लगभग 1650 से 1850 . के मध्य मानी जाती है।

इस समय भारत में मुगल शासन था। रीतिकाल की शुरुआत में मुगल शासन चरम पर था तथा इसके अंत तक आते आते मुगल शासन का पतन हो गया। यह समय सामंतवादी मानसिकता में दीक्षित मुख्यतः दरबारी कवियों का दौर था। ये कवि दरबारी चमक-दमक से भरी शृंगार की कविताओं को अपने काव्य के केन्द्र में रखते थे तथा इसके साथ ही अपने राजा की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा करने से भी नहीं चूकते थे।

इस काल में लिखी गई अधिकाँश कविताएँ संस्कृत के काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों को आधार बनाकर उनके अनुकरण करने की प्रवृत्ति के साथ लिखी गईं। इस अनुकरण करने की प्रवृत्ति को ही 'रीति' कहा गया। यही कारण है कि इस काल को रीतिकाल के नाम से जाना जाता है। विभिन्न काव्य-प्रवृत्तियों के आधार पर रीतिकाल का उपविभाजन पुनः चार काव्यधाराओं में किया गया- रीतिबद्ध काव्यधारा, रीतिसिद्ध काव्यधारा, रीतिमुक्त काव्यधारा और रीतिइतर काव्यधारा।

अध्ययन का उद्देश्य
  1. हिंदी साहित्य के काल विभाजन पर टिप्पणी उपरांत रीतिकालीन काव्य की प्रमुख विशेषताओं को प्रस्तुत करना।
  2. रीतिकाल के प्रमुख कवियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करना।
  3. घनानंद के व्यक्तित्व और कृतित्व और साथ ही उनके काव्य में निहित विरह-व्यथा के व्यक्तिगत कारणों का अध्ययन करना।
  4. घनानंद को रीतिकाल के अनुपम कवि के रूप में स्थापित करना।
  5. प्राक्कल्पना
  6. हिंदी साहित्य के विभिन्न काल खण्ड हैं जिनकी अलग-अलग प्रवृत्तियां और विशेषताएं हैं।
  7. रीतिकाल हिंदी साहित्य का विशिष्ट काल खण्ड है जिसके अंतर्गत भक्ति एवं श्रृंगार आधारित काव्य लिखा गया।
  8. रीतिकालीन कवियों में घनानंद का नाम उच्च स्तरीय कवियों में लिया जाता है।
  9. घनानंद की कविताओं में आत्मकथात्मक तत्व सर्वप्रमुख है जिसको स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 
  10. घनानंद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के अनुपम कवि हैं।
साहित्यावलोकन

1.   व्यंजना वशिष्ठ, राम (1955) ने अपनी पुस्तक 'महाकवि घनानंद' के अंतर्गत घनानंद को रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि के रूप में स्वीकार किया है तथा कहा है कि उनके काव्य में आत्मिक प्रेम, प्रेम की पीर और व्यथा आदि और साथ ही आत्मकथात्मक तत्व की प्रमुखता है जो उनको रीतिकालीन कवियों में विशिष्ट स्थान प्रदान करवाने में सहायक है।

2.   शर्मा, डॉ. शिवदत्त (2015) का अध्ययन 'घनानंद का भाषा-वैशिष्ट्य' घनानंद के बारे में यह टिप्पणी करता है कि घनानंद ब्रज भाषा के कवि हैं जिनका ब्रज भाषा पर पूर्ण अधिकार था। उन्होंने अपनी सबसे सशक्त भाषा 'ब्रज' को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। घनानंद स्वच्छंद प्रवृत्ति के कवि थे। उन्होंने अपनी प्रवृत्ति अनुसार स्वच्छंद भाषा का ही प्रयोग किया है। यही कारण है कि सभी विद्वान मुक्तकंठ से उनकी प्रशंसा की है। श्री ब्रजनाथ, श्री मनोहर लाल गौड़, आचार्य रामचंद्र शुक्ल एवं श्री कृष्ण चन्द्र वर्मा आदि सभी उनकी, उनके काव्य की और उनकी भाषा-शैली की भरपूर प्रशंसा करते हैं।

3.   कुमारी, ज्योति (2018) ने अपने अध्ययन 'घनानंद प्रेम/ भगत के काव्य में पीड़ा का प्रेम' में लिखा है कि 'घनानंद रीतिमुक्त  मुख्यधारा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। वह दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह के यहाँ मीर मुंशी थे और दरबार की कलाकार नर्तकी वैश्या 'सुजान' से सच्चा प्रेम करते थे। बादशाह की आज्ञा की अवमानना के कारण इनको देश निकाला दे दिया गया। उनको विश्वास था कि इस स्थिति में सुजान उनके साथ चलेगी। घनानंद ने सुजान से साथ चलने को कहा, परंतु सुजान ने ऐसा करने से मना कर दिया जिसके परिणामस्वरूप उनको वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह वृंदावन आकर निम्बार्क संप्रदाय में वैष्णव होगये और भगवान कृष्ण को 'सुजान' नाम से संबोधित कर अपनी विरह पीड़ा को अपनी भक्ति कविताओं में अभिव्यक्त करने लगे।

4.   संतोष (2020) ने अपने शोध पत्र 'रीतिमुक्त कवि घनानंद का ऋतु वर्णन' के अंतर्गत अभिव्यक्ति दी है कि रीतिमुक्त कवि घनानंद ने अपने काव्य में अद्भुत ऋतु वर्णन किया है। उक्त ऋतु वर्णन उनके द्वारा सुजान के प्रति प्रेम और उसमें निहित विरह, व्यथा, पीड़ा के संदर्भ में इस प्रकार किया है कि घनानंद एक ओर प्रेम और उससे उत्पन्न विरह-पीड़ा में डूबे हुए प्रतीत होते हैं, तो दूसरी ओर वह प्रकृति के महान कवि के रूप में आते हैं।

5.   कुमार, डॉ. विजय (2021) ने अपने शोधपत्र 'रूप रस के कवि घनानंद' के अंतर्गत उल्लेख किया है कि 'घनानंद रीतिकालीन कविता को वेदना की स्वानुभूति से स्पंदित करने वाले एक मात्र कवि हैं। परिस्थितिवश प्रेम में ठोकर खाकर उन्होंने अपने लौकिक वासनात्मक प्रेम को परिष्कृत कर उदात्तता के उस शिखर पर पहुँचा दिया जहाँ उनकी प्रेमिका सुजान प्रेमाभक्ति के आलंबन पुरुष श्रीकृष्ण का पर्याय बन जाती है। एक एकान्त प्रेमी से कृष्ण भक्त तक का उनका सफर विविध मनोदशाओं से भरा हुआ है, जिसकी उनके काव्य में हुई है।

घनानंद रूप और रस के कवि है। रूप-चित्रण में उनका कोई जोड़ नहीं है। इसका कारण है कि कवि हृदय को किसी के रूप से रागात्मक संबंध है। विद्यापति या बिहारी जब नायिका के सौन्दर्य का चित्रण करते हैं तो एक तटस्थता का भाव झलकता है। घनानंद के सौन्दर्य-चित्रण में हृदय की प्रफुल्लनता है जो किसी प्रेमी कवि में ही संभव है। कवि ने मुहम्मदशाह रंगीले की दरबारी नर्तकी को नित नूतन रूप में देखा था जिसकी सुन्दर चित्रमयी अभिव्यक्ति उनके काव्य में हुई।

घनानंद अपनी कविता मेंप्रेम का पीरबनकर उभरते हैं। सुजान के प्रेम में पगा कवि का हृदय उस समय हा! हा! खाकर व्यथित हो उठता है जब सुजान उसे धोखा दे देती है। परिस्थितिवश कवि उसी कातिल से न्याय की गुहार लगा रहे हैं, ईश्वरीय न्याय की दुहाई देते हैं – “कलपाओगे तो तुम भी कलपोगे। तदन्तर हारे हुए प्रेमी हृदय का पर्यावसान हम एक कृष्णभक्त कवि के रूप में पाते हैं, उसी समर्पण के साथ। उन्हें संसार में सर्वत्र सुजान-ही सुजान दिखाई देता है। परिणाम स्वरूप वे अपने आराध्य को भी सुझान नाम से ही पुकारते हैं– सदा कृपा निधान हौ कहा कहौ सुजान हौ।

सुजान हित’, ‘सुजान सागरआदि उनकी कृति उसी प्रेमिका को घनानंद का वियोग चित्रण हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। स्वयं कहते भी हैं – “जोग-वियोग की रीति मैं कोविद।उनके वियोग की व्याप्ति में उनका भक्ति साहित्य भी आ गया है। प्रेम की पीड़ा सहने के कारण घनानंद की अभिव्यक्ति में मार्मिकता है जो उन्हें रीति मुक्त काव्यधारा के कवियों में विशिष्ट बनाता है। जहॉं अन्य कवि सप्रयास कविता बनाने का उद्योग करते दीखते हैं वहॉं भावुक घनानंद को कविता ही बनाती चलती है– “लोग हैं लागि कवित्त बनावत मोहि तो मेरे कवित्त बना बत।भाव की मार्मिकता भाषा को भी मधुरता प्रदान करती चलती है। ब्रजभाषा का सुन्दर प्रयोग उनके कवितसवैयों में हुआ है।'

मुख्य पाठ

रीतिबद्ध काव्यधारा

रीतिबद्ध काव्यधारा में वे कवि शामिल हैं जो संस्कृत के काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों का ब्रजभाषा में अनुवाद करते हैं तथा उसके बाद इस सिद्धांत को समझाने के लिए उदाहरणस्वरूप ब्रजभाषा में कविता लिखते हैं। स्पष्ट है कि ब्रजभाषा में लिखे गए ये सिद्धान्त मौलिक नहीं हैं, लेकिन उदाहरणस्वरूप जो कविताएँ लिखी गईं वे मौलिक हैं। पद्माकर, केशवदास, चिंतामणि आदि इस काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं। इस काव्यधारा से जुड़े कवियों को रीतिबद्ध कवि कहा गया। पद्माकर का एक उदाहरण दृष्टव्य है

गुलगुली गिल में गलीचा है, गुणीजन है,

चाँदनी है, चिक है, चिरागन की माला है।

कहै पद्माकर ज्यों गजक गिजा है सजी,

सेज है, सुराही है, सुरा है और प्याला है।

रीतिसिद्ध काव्यधारा
रीतिसिद्ध काव्यधारा के कवियों ने संस्कृत के काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों का अनुवाद नहीं किया, लेकिन कविताएँ इन्हीं सिद्धान्तों को आधार बना के लिखीं। रीतिसिद्ध काव्यधारा के कवि काव्य को आनंद प्राप्ति का साधन मानते हैं। अतः सामंती मानसिकता के साथ भोगमूलक शृंगार को अपनी कविता के केन्द्र में रखते हैं। इस काव्यधारा के सबसे प्रमुख कवि हैं-बिहारीलाल। बिहारी न सिर्फ इस काव्यधारा के बल्कि सम्पूर्ण रीतिकाल के सिरमौर माने जाते हैं। बिहारी के अनुसार कला का हर रूप आनंद प्राप्ति का साधन है।

तंत्रीनाद, कवित्त रस, सरस राग, रति रंग।

अनबूड़े बूड़े, तिरे जे बूड़े सब अंग।।

रीतिमुक्त काव्यधारा
इस काव्यधारा के कवियों ने न तो संस्कृत के काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों का अनुवाद किया और न ही इन सिद्धान्तों को आधार मान कर कविताएँ लिखीं। अतः ये कवि अनुकरण की रीति से मुक्त थे। इसलिए इस काव्यधारा को रीतिमुक्त कहा गया। इन कवियों ने संयोग की तुलना में वियोग को अधिक महत्त्व दिया। ये कवि यह मानते थे कि विरह जितना गहरा होगा, प्रेम भी उतना ही गहरा होगा। यहाँ एकनिष्ठ दायित्त्वमूलक प्रेम के प्रति प्रतिबद्धता दिखती है। घनानंद, द्विजदेव आदि इस काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं।

"तुम कौन धौं पाटी पढ़े हो लला, मन लेहु पै देहु छटांक नहीं "

रीतिइतर काव्यधारा

रीतिइतर काव्यधारा के कवियों ने न तो संस्कृत के काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों को आधार बनाकर कविताएँ लिखी और न ही शृंगार से युक्त कविताएँ। यहाँ पर मुख्यतः भक्तिकाव्य, वीरकाव्य तथा नीति काव्य से सम्बंधित कविताएँ देखने को मिलती हैं। इसीलिए इसे रीतिइतर काव्य कहा गया। भक्तिकाल की चारों काव्यधाराएँ अभी भी मौजूद थी। हालाँकि भक्तिकाल जितनी मजबूती के साथ नहीं थी। अतः भक्तिकाव्य देखने को मिलता है। दरिया साहब का एक उदाहरण दृष्टव्य है

"जात हमारी ब्रह्म है, मात पिता है राम।

गिरह हमारा सुन्न में, अनहद में बिसराम।।"

भूषण, गुरुगोविंद सिंह आदि कवियों ने वीर काव्य की रचना की तथा नीतिकाव्य में कवि वृन्द और गिरिधर कविराय का योगदान उल्लेखनीय है। समग्रतः स्पष्ट है कि रीतिकाल का अधिकांश काव्य दरबारी माहौल में सामंती मानसिकता के साथ लिखा गया जिसमें मुख्यतः भोगमूलक श्रृंगार कविता के केन्द्र में है, परंतु साथ ही यह भी सच है कि राजाओं की अतिशयोक्ति पूर्ण प्रशंसा युक्त वीरकाव्य, भक्तिकाल की चारों काव्यधाराओं का भक्ति काव्य और स्वतंत्र नीति काव्य भी देखने को मिलता है।

लगभग 95 वर्ष पूर्व हिंदी आलोचना साहित्य के शलाका पुरुष और प्रकाश स्तम्भ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने महान ग्रंथ 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में महाकवि सूरदास को हिंदी साहित्याकाश का "सूर" अर्थात सूर्य कहा है। सूरदास के बारे में उनका कहना है की बालसुलभ भावों और चेष्टाओं के स्वाभाविक चित्रों एवं श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का इतना भंडार और कहीं नहीं मिलता जितना सूर की रचनाओं में है।

घनानन्द की प्रशंसा में वह सूरदास पर लिखित अपने प्रशस्तिगान को भूल जाते हैं और घनानन्द के कवित्त की रसवैतरणी में बहते हुए कहते हैं -’ये साक्षात रसमूर्ति और बृजभाषा काव्य के प्रधान स्तंभों में हैं। प्रेम मार्ग का ऐसा प्रवीण और धीर पथिक तथा जबांदानी का ऐसा दावा रखनेवाला बृजभाषा का दूसरा कवि नहीं हुआ। शुक्ल जी यहीं नहीं रुके । आगे कहते हैं:

"यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि भाषा पर जैसा अचूक अधिकार घनानंद का  था वैसा और किसी कवि का नहीं। भाषा मानो इनके हृदय के साथ जुड़कर ऐसी वशवर्तिनी हो गई थी कि वह उसे अपनी अनूठी भावभंगी के साथ साथ जिस रूप में चाहते थे उस रूप में मोड़ सकते थे। घनानन्द जी उन विरले कवियों में हैं जो भाषा की व्यंजकता बढ़ाते हैं। अपनी भावनाओं के अनूठे रूपरंग की व्यंजना के लिए भाषा का ऐसा बेधड़क प्रयोग करनेवाला हिन्दी के पुराने कवियों में कोई दूसरा नहीं हुआ।"

'घनानन्द कवित्त' घनानंद की एक प्रेम कृति है जिसमें उन्होंने अपनी प्रेयसी सुजान के वियोग में अपनी पीर को प्रस्तुत किया है। घनानन्द के हृदय में सुलगती विरह वेदना की उस आंच को अनुभव करने के लिए उदाहरण स्वरूप उनके  प्रसिद्ध कवित्त जिनमें एक में वे सुजान से निष्ठुरता का उलाहना देते हुए कहते हैं-

"हे सुजान, प्रेम का मार्ग तो बहुत सीधा और सरल है उसमे सयानेपन की अर्थात चतुराई या कुटिलता की कोई जगह नहीं । मेरे मन में केवल तुम समाई हो तुम्हारे अलावा किसी और के प्रति निष्ठा की कोई भी गुंजाइश नहीं, फिर भी तुम ना जाने कौन सी पट्टी पढ़ी हो अर्थात कहाँ से शिक्षा ली है कि मन भर तो लेलेती हो लेकिन देती छटांक भर भी नहीं। यानि मेरा मन चुराकर अपने सौन्दर्य की झलक तक नहीं दिखाते। तुमने मेरा मन तो अधिकार पूर्वक कब्जा लिया लेकिन अब प्रेम कटाक्ष भी देने से मुकरते हो।"

अति सुधो सनेह को मारग है,जहां नैक सयानप बाँक नहीं ।

तहाँ साँचे चलें तजि आपनपो झझकें कपटी जो निसाँक नहीं॥

घनआनंद प्यारे सुजान सुनौं यहाँ एक ते दूसरी आंक नहीं ।

तुम कौन सी पाटी पढ़े हो लला , मन लेहु, पै देहु छटांक नहीं॥

एक और कवित्त में घनानन्द पवन से याचना कर रहे हैं कि वह उनके प्रियतम सुजान के चरणों की धूल ले आवे ताकि उसको अपने नेत्रों में आंजकर अपनी वियोगव्यथा को कुछ शांत कर सकें-

ऐ रे बीर पौन!, तेरो सबै ओर गौन, वारि

तो सों और कौन, मनैं ढरकों ही बानि दै ।

जगत के प्रान, ओछे बड़े को समान घन-

आनंद -निधान, सुखदान दुखियानि दै ।

जान उजियारे, गुन भारे अति मोहि प्यारे ,

अब ह्वै अमोही बैठे, पीठि पहचानि दै।

बिरह-बिथा की मूरि, आंखिन में राखौं पूरि ,

धूरि तिन पायन की हा ! हा ! नैकु आनि दे ॥

घनानंद जी के बारे में सामान्यतः यह विश्वास है कि सुजान के प्रति उनका एक तरफ़ा प्रेम था और उनकी प्रेयसी ने उनको और उनके प्रेम को कभी गंभीरता से नहीं लिया। सुजान की बेरुखी से व्यथित होकर और उसी के कारण तत्कालीन मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला जिसके ये मीर मुंशी थे , के द्वारा दरबार से निकाले जाने के बाद वे बृंदाबन में बस कर निम्बार्क संप्रदाय में दीक्षित हो वैष्णव हो गये और भगवान श्री कृष्ण में ही अपनी सुजान की कल्पना कर कवित्त रचना करने लगे।

विरह वेदना और प्रेमविदग्धता की पराकाष्ठा में वे कृष्ण में ही सुजान का आरोप करने लगे और उनको ही सुजान सम्बोधन देने लगे। शायद इसीलिए कहा जाता है कि खालिस प्रेम जब अपने उदय के सर्वोच्च बिन्दु पर पहुंचता है तो प्रेमी/प्रेमिका और ईश्वर परस्पर एकाकार हो जाते हैं। घनानन्द के साथ ऐसा ही हुआ और वह अपने लगभग प्रत्येक कवित्त में भगवान कृष्ण को सुजान कह कर सम्बोधित करने लगे।

सामग्री और क्रियाविधि

प्रस्तुत शोध अध्ययन की प्रकृति पूर्णतः वैज्ञानिक है क्योंकि इस हेतु निर्धारित साहित्य शोध प्रक्रिया का पालन किया गया है। अध्ययन का सुव्यवस्थित विचार-विकास एवं निष्कर्ष लेखक के स्वाध्याय, पूर्व अध्ययन और प्रकाशित द्वितीयक तथ्यों पर आधारित है। प्रस्तुत गुणात्मक एवं विवेचनात्मक शोध अध्ययन घनानंद के रीतिकालीन हिंदी काव्य को देय योगदान केन्द्रित है।

निष्कर्ष

हिंदी साहित्य के रीति काल (1650-1850) में प्रमुखतः श्रृंगार रस, नायक-नायिका भेद, और काव्य के अलंकारों का वर्णन होता है। रीति कालीन साहित्य में श्रृंगार, अलंकार, और भाषा की कलात्मकता प्रमुख है। इस काल के कवियों को मुख्य रूप से रीति काव्य परंपरा में बांटा जाता है। रीति कालीन कवि तीन मुख्य वर्गों में आते हैं-

1. रीतिबद्ध कवि
रीतिबद्ध कवि रीति (काव्यशास्त्र) के सिद्धांतों पर आधारित कविताएँ रचते थे। भूषण, केशवदास, बिहारी लाल, चिंतामणि त्रिपाठी, मतिराम आदि।

 

2. रीति मुक्त कवि
रीति मुक्त कवियों का काव्य रीति (शास्त्रीयता) के बंधन में नहीं बंधा था। कबीरदास (हालाँकि वे भक्ति काल के कवि माने जाते हैं, परंतु रीति काल में भी उनकी काव्य शैली की चर्चा होती है।), जायसी, अलवलि आदि।

 

3. श्रृंगारिक कवि
श्रृंगारिक कवियों ने श्रृंगार रस को अपने काव्य का मुख्य विषय बनाया। बिहारी (बिहारी सतसई के रचयिता), देव (देव कवि), घनानंद, कृष्ण भट्ट, कवि भूषण आदि।

 

प्रमुख रीतिकालीन कवि और उनकी विशेषताएँ

  1. बिहारी- "बिहारी सतसई" के लिए प्रसिद्ध। दोहों में गहरी भावाभिव्यक्ति और अलंकारिक सौंदर्य दिखता है। मुख्य रूप से श्रृंगार रस और नीति का वर्णन।
  2. केशवदास- "रसिकप्रिया," "कवि प्रिया," और "रामचंद्रिका" के रचयिता। रीति काव्य के प्रवर्तक माने जाते हैं।
  3. भूषण- वीर रस के कवि। छत्रपति शिवाजी और बुंदेलों की वीरता का वर्णन। "शिवराज भूषण" और "भूषण हजारा" के रचयिता।
  4. देव- श्रृंगार रस के कवि। भाषा की सरलता और प्रवाह के लिए प्रसिद्ध।
  5. घनानंद- विरह और प्रेम के सूक्ष्म भावों के कवि। उनके काव्य में नायिका के प्रति गहरी करुणा और प्रेम का चित्रण।

निष्कर्षतः, घनानंद हिंदी साहित्य के रीतिकाल की आजाद धारा के कवि हैं। श्रृंगार रस को प्रमुखता से अपनी कविता में बरतने वाले घनानंद कृष्ण की भक्ति उनकी सखी-सहेली होने के भाव से करते हैं।  घनानंद की आसक्ति और विरक्ति दोनों ही उल्लेखनीय हैं। सामान्य मान्यतानुसार, वह बहादुरशाह के मीर मुंशी थे और वहीं पर सुजान नाम की एक नर्तकी से उन्हें प्रेम हो गया। जिंदगी से जुड़े धुंधले तथ्यों के साथ साहित्य में मौजूद घनानंद की कविताओं का एक बड़ा हिस्सा सुजान को ही संबोधित है। सुजान के प्रेम में चोट खाकर ही घनानंद वैरागी हुए।आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने 'घनानंद ग्रंथावली' संपादित की है, जिसमें घनानंद का वह काव्य-संसार मौजूद है जो किसी भी कवि को युगों तक यादगार बनाए रखने के लिए पर्याप्त है।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
  1. कुमार, डॉ. विजय (2021). रूप रस के कवि घनानंद. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ एप्लाइड रिसर्च., 7(1): 479-483.
  2. कुमारी, ज्योति (2018). घनानंद प्रेम/ भगत के काव्य में पीड़ा का प्रेम. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इनोवेटिव रिसर्च स्टडीज., 82-86. 
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  4. शर्मा, डॉ. शिवदत्त (2015). घनानंद का भाषा-वैशिष्ट्य. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ एप्लाइड रिसर्च., 1(13):698-700.    
  5. वशिष्ठ, राम (1955). महाकवि घनानंद. विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा।