P: ISSN No. 2394-0344 RNI No.  UPBIL/2016/67980 VOL.- IX , ISSUE- IV July  - 2024
E: ISSN No. 2455-0817 Remarking An Analisation
जलवायु परिवर्तन एवं कृषि
Climate Change and Agriculture
Paper Id :  19132   Submission Date :  2024-07-06   Acceptance Date :  2024-07-22   Publication Date :  2024-07-25
This is an open-access research paper/article distributed under the terms of the Creative Commons Attribution 4.0 International, which permits unrestricted use, distribution, and reproduction in any medium, provided the original author and source are credited.
DOI:10.5281/zenodo.14058652
For verification of this paper, please visit on http://www.socialresearchfoundation.com/remarking.php#8
राम खिलाड़ी मीना
सहायक आचार्य
अर्थशास्त्र विभाग
स्व. प. न. कि. शर्मा राजकीय महाविद्यालय
दौसा,राजस्थान, भारत
सारांश
पिछले कुछ दशकों से विश्व के सभी देशो ने तीव्र गति से औद्योगिक विकास किया हैं। इस बढ़ते औद्योगिक विकास का जलवायु परिवर्तन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। आज जलवायु परिवर्तन की समस्या का पूरा संसार  सामना कर रहा है। जिससे भारत भी अछूता नहीं रह पाया। जलवायु परिवर्तन से तापमान वृद्धि, अनियमत वर्षा, भू-स्खलन, जल प्रदूषण. वायु प्रदुषण, चक्रवात आदि का कृषि पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। आज तक मानव ने इस तरह के जलवायु परिवर्तन के संकट का सामना नहीं किया है, लेकिन यही हालात रहे तो हम जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से आने वाली पीढ़ी के जीवन को नहीं बचा पायेंगे। हम कई तरह से पर्यावरण को नुकसान पंहुचा रहे है।
सारांश का अंग्रेज़ी अनुवाद Today the whole world is facing the problem of climate change, from which India too has not remained untouched. Climate change is an important point. It has been told earlier by many scientists that climate change is a serious problem. Due to this, many types of changes in the environment such as temperature rise, uneven distribution of rainfall, landslides, air pollution, cyclones etc. are having a negative impact on agriculture. Because till date humans have not been forced to face such a big crisis of climate change, but if the situation remains the same, then we will not be able to save the lives of future generations on this earth from the effects of climate change. Due to many reasons, we are harming the environment.
मुख्य शब्द जलवायु परिवर्तन, कृषि , पर्यावरण।
मुख्य शब्द का अंग्रेज़ी अनुवाद Climate Change, Agriculture, Environment.
प्रस्तावना

बढ़ते भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है। बढ़ते जलवायु परिवर्तन से हमारी कृषि योग्य भूमि पर विपरीत प्रभाव पढ़ रहा हैं। साथ ही हमारा भविष्य भी खतरे मे नजर आ रहा है। जलवायु परिवर्तन, औद्योगिकीकरण तथा बढ़ते वाहनों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। इन सब बातों को ध्यान मे रखकर हमे पर्यावरण संरक्षित दिनचर्या अपनाना होगी।औद्योगिक क्रांति एवं बदलती मानवीय आवश्यकताओं के बाद से पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) की वैश्विक सांद्रता बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन आंतरिक प्रवास का एक शक्तिशाली चालक बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन से अस्थिरता बढ़ती है और गरीबी समाप्त करने के प्रयासों को खतरा है। इस  कार्रवाई के बिना, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कम किया जा सकता हैं।  पृथ्वी की सतह का औसत तापमान लगभग 15 डिग्री सेल्सियस है, वह तापमान हरित ग्रह प्रभाव के न होने पर जो तापमान होता उससे तकरीबन 33 डिग्री सेल्सियस अधिक है। हरित ग्रह गैसों के अभाव में पृथ्वी की सतह का अधिकांश भाग -18 डिग्री सेल्सियस से औसत वायु तापमान पर जमा हुआ होता है। अतः हरिता ग्रह गैसों का एक सीमा में पृथ्वी के वातावरण में उपस्थिति जीवन के उदगम विकास एवं निवास हेतु अनिवार्य है। इसलिये  जलवायु परिवर्तन वर्तमान में सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक चुनौतियों में से एक है। क्योंकि दुनिया भर के देश और समुदाय पहले से ही जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना कर रहे हैं। कार्बन-डाइ-ऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से व तापमान में वृद्धि से पेड़-पौधों तथा कृषि पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा। यह परिवर्तन कुछ क्षेत्रों के लिए लाभदायक हो सकता है तो कुछ क्षेत्रों के लिए नुकसानदायक।

अध्ययन का उद्देश्य
1. जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करना
2. कृषि उपज बढ़ाना
साहित्यावलोकन
सिंह, ए. के., कुमार, एस. और  ज्योति, बी. (2022) ने  भारत में कृषि स्थिरता के साथ जलवायु कारकों के संबंध का आकलन किया गया हैं। परिणामों से मालूम चलता है,कि अधिकतम तापमान का कृषि स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा हैं। इसके अलावा यह पाया गया कि आर्थिक दक्षता, सामाजिक इक्विटी और जलवायु कारकों का कृषि स्थिरता के साथ एक गैर-रैखिक संबंध है। सुझाव में नीति निर्माताओं को आर्थिक विकास, सामाजिक विकास और पारिस्थितिक सुरक्षा को बढ़ाने के लिए एक एकीकृत नीति को केंद्रीकृत करना चाहिए।
भट्टाचार्य, एस. और सचदेव, बी. के. (2021) ने सतत कृषि द्वारा पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने में मदद करने का आकलन किया गया हैं। शोध अध्ययन से पता चलता हैं, कि सतत खेती ग्रामीण लोगों की समस्या को काफी हद तक हल करने और ग्रीनहाउस मामलों के उपयोग को समाप्त करने या कम करने, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने और इसे बनाने के लिए एक हथियार है। हमें प्रकृति और पर्यावरण संसाधनों को ध्यान में रखते हुए सतत विकास की ओर बढ़ने की आवश्यकता हैं। केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर इस दिशा में काम करने का सुझाव दिया।   
देशमुख, एम.एस., पाटील, डी. आर. औरं  सारथी (2021) ने शोध अध्ययन में पश्चिमी महाराष्ट्र में कोल्हापुर जिले के सतत कृषि विकास के विभिन्न घटकों में स्थानिक भिन्नता का आकलन किया। शोध अध्ययन के परिणामों से मालूम चलता हैं, कि सतत कृषि सूचकांक में कमी आई है, जिससे सतत कृषि विकास के विभिन्न घटकों में सुधार की आवश्यकता   है। अध्ययन के परिणामों का उपयोग कोल्हापुर जिले में कृषि स्थिरता मे बढ़ोतरी हेतु एवं नीतिगत ढांचा तैयार करने के लिए किया जा सकता है।
देशमुख, एम. एस. और पाटिल, डी. आर.(2019)  ने भारत के विभिन्न राज्यों(29) की कृषि स्थिरता और आजीविका सुरक्षा का मूल्यांकन किया गया है। अध्ययन में स्थायी आजीविका सुरक्षा सूचकांक बनाने के लिए यूएनडीपी पद्धति को अपनाया गया हैं। परिणामों से पता चलता है, कि भारत के विभिन्न राज्यों में स्थायी कृषि के सफल विकास के लिए व्यापक क्षेत्रीय असमानताएं थीं। तथा अधिकांश राज्य सतत आजीविका सुरक्षा सूचकांक (SLSI) की मध्यम श्रेणी के अंतर्गत पाए गये हैं।
विश्लेषण
जलवायु परिवर्तन
पर्यावरण में होने वाले अवांछित परिवर्तन जैसे:- तापमान में अनियमित परिवर्तन, अनियमित वर्षा, बर्फबारी एवं विभिन्न आयामों में होने वाले दीर्घकालिक परिवर्तन को जलवायु परिवर्तन कहते है। जलवायु परिवर्तन से भूमि के तापमान में होने वाली परिवर्तन वर्षा की औसत मात्रा में बदलाव लाती है।
जलवायु परिवर्तन का कृषि पर प्रभाव
कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित है।कृषि भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह खाद्य पोषण एवं एवं आजीविका संबंधी सुरक्षा प्रदान करती है भारत में लगभग 60% से भी अधिक लोग कृषि पर आश्रित हैं। कृषि का जीडीपी मैं योगदान 17% है। आजकल पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन की समस्या से जूझ रहा है जिसमें भारत भी अछूता नहीं रहा हैं । जलवायु परिवर्तन एक प्राकृतिक क्रिया है किंतु मानवीय गतिविधियों द्वारा जलवायु परिवर्तन के दर में परिवर्तन चिंता का विषय है जलवायु में आए इन परिवर्तनों के कारण दो भागों विभाजित किया जा सकता प्रथम प्राकृतिक और दूसरा मानवीय गतविधियांजलवायु परिवर्तन का कृषि, जल उपलब्धता और गुणवत्ता और तटीय क्षेत्रों और हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र जैसे पारिस्थितिक तंत्र सहित कई क्षेत्रों और संसाधनों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। वे प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और परिमाण पर भी प्रभाव डालेंगे। तापमान में बहुत मामूली बदलाव उन प्रणालियों पर बड़े प्रभाव डाल सकते हैं जिन पर मानव आजीविका निर्भर करती है, जिसमें पानी की उपलब्धता और फसल उत्पादकता में परिवर्तन, समुद्र के स्तर में वृद्धि के कारण भूमि का नुकसान और बीमारी का प्रसार शामिल है। कई अलग-अलग समुदायों के जीवन और आजीविका खतरे में होंगे। ग्रामीण क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। खाद्य सुरक्षा चिंताओं के लिए जिम्मेदार प्रमुख कारक बढ़ती आबादी, अनियमित मानसून और वर्षा आधारित कृषि, अक्षम जल प्रबंधन और मिट्टी पोषक तत्व प्रबंधन, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के बारे में सीमित जागरूकता, ठंढ, भारी वर्षा आदि जैसी चरम जलवायु घटनाएं, आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी तक खराब पहुंच, कृषि भूमि का सिकुड़ना है। जलवायु परिवर्तन के कारण कृषकों के लिए जल आपूर्ति की भयंकर समस्या हो जाएगी तथा बाढ़ एवं सूखे की बारम्बारता में वृद्धि होगी। अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में लम्बे शुष्क मौसम तथा फसल उत्पादन की असफलता बढ़ती जाएगी। यही नहीं, बड़ी नदियों के मुहानों पर भी कम जल बहाव, लवणता, बाढ़ में वृद्धि तथा शहरी व औद्योगिक प्रदूषण की वजह से सिंचाई हेतु जल उपलब्धता पर भी खतरा महसूस किया जा सकता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण विश्व कृषि इस सदी में गंभीर गिरावट का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल के अनुसार, वैश्विक कृषि पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव नकारात्मक होगा। हालांकि कुछ फसल इससे लाभान्वित भी होंगी किन्तु फसल उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक होगा। हमारे जीवन में भूमिगत जल की महत्ता सबसे अधिक है। पीने के साथ-साथ कृषि व उद्योगों के लिए भी इसी जल का उपयोग किया जाता है। जनसंख्या बढ़ने के साथ ही पानी की माँग में बढ़ोत्तरी होने लगी है यह स्वाभाविक है परन्तु बढ़ते जल प्रदूषण और उचित जल प्रबन्धन न होने के कारण पानी आज एक समस्या बनने लगी है। सारी दुनिया में पीने योग्य पानी का अभाव होने लगा है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान के उच्च अक्षांश की और खिसकने से निम्न अक्षांश प्रदेशों में कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। भारत के जल स्रोत तथा भंडार तेजी से सिकुड़ रहे हैं जिससे किसानों को परम्परागत सिंचाई के तरीके छोङकर पानी की खपत कम करने वाले आधुनिक तरीके एवं फसल अपनानी होंगी। ग्लेशियर के पिघलने से कई बड़ी नदियों के जल संग्रहण क्षेत्र में दीर्घावधिक रूप से कमी आ सकती है जिससे कृषि एवं सिंचाई में जलाभाव से गुजरना पड़ सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रदूषण, भू-क्षरण और सूखा पड़ने से पृथ्वी के तीन चौथाई भूमि क्षेत्र की गुणवत्ता कम हो रहा हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले कई दशकों में तापमान में वृद्धि हुई है। औद्योगीकरण के प्रारंभ से अब तक पृथ्वी के तापमान में लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। कुछ पौधे ऐसे होते हैं जिन्हें एक विशेष तापमान की आवश्यकता होती है। वायुमंडल के तापमान बढ़ने पर उनके उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जैसे गेंहू, सरसो, जौ और आलू आदि इन फसलों को कम तापमान की आवश्यकता होती है जबकि तापमान का बढ़ना इनके लिए हानिकारक होता है। इसी प्रकार अधिक तापमान बढ़ने से मक्का, ज्वार और धान आदि फसलों का क्षरण हो सकता है क्योंकि अधिक तापमान के कारण इन फसलों में दाना नहीं बनता अथवा कम बनता है। इस प्रकार तापमान की वृद्धि इन फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। वर्षा के पैटर्न में बदलाव भारत का दो तिहाई कृषि क्षेत्र वर्षा पर निर्भर है और कृषि की उत्पादकता वर्षा एवं इसकी मात्रा पर निर्भर करती है। वर्षा की मात्रा व तरीकों में परिवर्तन से मृदा क्षरण और मिट्टी की नमी पर प्रभाव पड़ता है। जलवायु के कारण तापमान में वृद्धि से वर्षा में कमी होती है जिससे मिट्टी में नमी समाप्त होती जाती है। इसके अतिरिक्त तापमान में कमी व वृद्धि होने का प्रभाव वर्षा पर पड़ता है जिस कारण भूमि में अपक्षय और सूखे की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव कुछ वर्षों से गहन रूप से प्रभावित कर रहे हैं। मध्य भारत 2050 तक शीत वर्षा में 10 से 20 प्रतिशत तक कमी अनुभव करेगा। पश्चिमी अर्धमरुस्थलीय क्षेत्र द्वारा सामान्य वर्षा की अपेक्षा अधिक वर्षा प्राप्त करने की संभावना है। इसी प्रकार मध्य पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान में वृद्धि एवं वर्षा में कमी से चाय की फसल में कमी हो सकती है। इससे समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी हो जाती है।
भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित है।कृषि भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह खाद्य पोषण एवं एवं आजीविका संबंधी सुरक्षा प्रदान करती है भारत में लगभग  60% से भी अधिक लोग कृषि पर आश्रित हैं। कृषि का जीडीपी मैं योगदान 17% है। आजकल पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन की समस्या से जूझ रहा है जिसमें भारत भी अछूता नहीं रहा हैं । जलवायु परिवर्तन एक प्राकृतिक क्रिया है किंतु मानवीय गतिविधियों द्वारा जलवायु परिवर्तन के दर में परिवर्तन चिंता का विषय है जलवायु में आए इन परिवर्तनों के कारण दो भागों  विभाजित किया जा सकता प्रथम प्राकृतिक और दूसरा मानवीयजलवायु नियंत्रित विश्व में सतत कृषि पद्धतियां एक देश की पोषण सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। विश्व में एक भी देश ऐसा नहीं है, जो किसी न किसी रूप में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों का सामना नहीं कर रहा हो। वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों के अधिक उत्सर्जन के परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन हुआ है। जिसने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि क्षेत्र को प्रभावित किया है। आज भारत में तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या, औद्योगीकरण, शहरीकरण, पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं की कमी, कृषि भूमि के घटते आकार, भूमिगत जल-स्तर में निरंतर गिरावट, खेती की बढ़ती लागत, किसानों के गैर-कृषि क्षेत्र की ओर स्थानांतरण, कम कृषि अनुसंधान एवं विकास व्यय, सरकार का कृषि प्रति कम रुझान और वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन  जैसी कई समस्याओं का सामना कर रहा है। इन समस्याओं से निपटने के लिए कृषि विकास के स्थायी तरीकों को अपना रहे है, जिसमें सतत कृषि की आवश्यकता महसूस हुई। भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सतत कृषि को अपनाना महत्वपूर्ण है।
गतविधियां जलवायु परिवर्तन का कृषि, जल उपलब्धता और गुणवत्ता और तटीय क्षेत्रों और हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र जैसे पारिस्थितिक तंत्र सहित कई क्षेत्रों और संसाधनों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।वे प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और परिमाण पर भी प्रभाव डालेंगे खाद्य सुरक्षा चिंताओं के लिए जिम्मेदार प्रमुख कारक बढ़ती आबादी, अनियमित मानसून और वर्षा आधारित कृषि, अक्षम जल प्रबंधन और मिट्टी पोषक तत्व प्रबंधन, मिट्टी की गुणवत्ता में गिराव पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के बारे में सीमित जागरूकता, ठंढ, भारी वर्षा आदि जैसी चरम जलवायु घटनाएं, आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी तक खराब पहुंच, कृषि भूमि का सिकुड़ना है। जलवायु परिवर्तन के कारण कृषकों के लिए जल आपूर्ति की भयंकर समस्या हो जाएगी तथा बाढ़ एवं सूखे की बारम्बारता में वृद्धि होगी। अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में लम्बे शुष्क मौसम तथा फसल उत्पादन की असफलता बढ़ती जाएगी। यही नहीं, बड़ी नदियों के मुहानों पर भी कम जल बहाव, लवणता, बाढ़ में वृद्धि तथा शहरी व औद्योगिक प्रदूषण की वजह से सिंचाई हेतु जल उपलब्धता पर भी खतरा महसूस किया जा सकता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण विश्व कृषि इस सदी में गंभीर गिरावट का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल के अनुसार, वैश्विक कृषि पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव नकारात्मक होगा। हालांकि कुछ फसल इससे लाभान्वित भी होंगी किन्तु फसल उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक होगा। हमारे जीवन में भूमिगत जल की महत्ता सबसे अधिक है। पीने के साथ-साथ कृषि व उद्योगों के लिए भी इसी जल का उपयोग किया जाता है। जनसंख्या बढ़ने के साथ ही पानी की माँग में बढ़ोत्तरी होने लगी है यह स्वाभाविक है परन्तु बढ़ते जल प्रदूषण और उचित जल प्रबन्धन न होने के कारण पानी आज एक समस्या बनने लगी है। सारी दुनिया में पीने योग्य पानी का अभाव होने लगा है।भारत का दो तिहाई कृषि क्षेत्र वर्षा पर निर्भर है और कृषि की उत्पादकता वर्षा एवं इसकी मात्रा पर निर्भर करती है। वर्षा की मात्रा व तरीकों में परिवर्तन से मृदा क्षरण और मिट्टी की नमी पर प्रभाव पड़ता है। जलवायु के कारण तापमान में वृद्धि से वर्षा में कमी होती है जिससे मिट्टी में नमी समाप्त होती जाती है। इसके अतिरिक्त तापमान में कमी व वृद्धि होने का प्रभाव वर्षा पर पड़ता है जिस कारण भूमि में अपक्षय और सूखे की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान के उच्च अक्षांश की और खिसकने से निम्न अक्षांश प्रदेशों में कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। भारत के जल स्रोत तथा भंडार तेजी से सिकुड़ रहे हैं जिससे किसानों को परम्परागत सिंचाई के तरीके छोङकर पानी की खपत कम करने वाले आधुनिक तरीके एवं फसल अपनानी होंगी। ग्लेशियर के पिघलने से कई बड़ी नदियों के जल संग्रहण क्षेत्र में दीर्घावधिक रूप से कमी आ सकती है जिससे कृषि एवं सिंचाई में जलाभाव से गुजरना पड़ सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रदूषण, भू-क्षरण और सूखा पड़ने से पृथ्वी के तीन चौथाई भूमि क्षेत्र की गुणवत्ता कम हो रहा हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले कई दशकों में तापमान में वृद्धि हुई है। औद्योगीकरण के प्रारंभ से अब तक पृथ्वी के तापमान में लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। कुछ पौधे ऐसे होते हैं जिन्हें एक विशेष तापमान की आवश्यकता होती है। वायुमंडल के तापमान बढ़ने पर उनके उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जैसे गेंहू, सरसो, जौ और आलू आदि इन फसलों को कम तापमान की आवश्यकता होती है जबकि तापमान का बढ़ना इनके लिए हानिकारक होता है। इसी प्रकार अधिक तापमान बढ़ने से मक्का, ज्वार और धान आदि फसलों का क्षरण हो सकता है क्योंकि अधिक तापमान के कारण इन फसलों में दाना नहीं बनता अथवा कम बनता है। इस प्रकार तापमान की वृद्धि इन फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
र्मिंग के प्रभाव कुछ वर्षों से गहन रूप से प्रभावित कर रहे हैं। मध्य भारत 2050 तक शीत वर्षा में 10 से 20 प्रतिशत तक कमी अनुभव करेगा। पश्चिमी अर्धमरुस्थलीय क्षेत्र द्वारा सामान्य वर्षा की अपेक्षा अधिक वर्षा प्राप्त करने की संभावना है। इसी प्रकार मध्य पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान में वृद्धि एवं वर्षा में कमी से चाय की फसल में कमी हो सकती है।
कार्बन डाइऑक्साइड गैस वैश्विक तापन में लगभग 60 प्रतिशत की भागीदारी करती है। कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि से व तापमान में वृद्धि से पेड़-पौधों तथा कृषि पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। पिछले 30-50 वर्षों के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगभग 450 पीपीएम (प्वाइंट्स पर मिलियन) तक पहुँच गयी है। हालांकि कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि कुछ फसलों जैसे गेहूं तथा चावल के लिए लाभदायक है क्योंकि ये प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को तीव्र करती है और वाष्पीकरण के द्वारा होने वाली हानियों को कम करती है। परन्तु इसके बावजूद कुछ मुख्य खाद्यान्न फसलों जैसे गेंहू की उपज में काफी गिरावट आई है जिसका कारण कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि ही है अर्थात तापमान में वृद्धि। कीट एवं रोगों में वृद्धि जलवायु परिवर्तन के कारण कीटों और रोगाणुओं में वृद्धि होती है। गर्म जलवायु में कीट-पतंगों की प्रजनन क्षमता बढ़ जाती है जिससे कीटों की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है और इसका कृषि पर काफी दुष्प्रभाव पड़ता है। साथ ही कीटों और रोगाणुओं को नियंत्रित करने की कीटनाशकों का प्रयोग भी कहीं ना कहीं कृषि फसल के लिए नुकसानदायक ही होता है।हालांकि कुछ अधिक सूखा-सहिष्णु फसलों को जलवायु परिवर्तन से लाभ हुआ है। ज्वार की पैदावार, जिसका खाद्यान्न के रूप में प्रयोग दुनिया में विकासशील देश के अधिकांश लोग करते हैं, 1970 के दशक के बाद पश्चिमी, दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में लगभग 0.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उप सहारा अफ्रीका में 0.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई। किन्तु यदि कुछ फसलों को छोड़ दिया जाए तो, कुल फसल उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव नकारात्मक ही पड़ता है। कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के उपाय खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुमानुसार, 2050 तक विश्व की जनसंख्या लगभग 9 अरब हो जाएगी। जिससे खाद्यान्न की आपूर्ति और मांग के बीच अंतर को कम करने के लिए मौजूदा खाद्यान्न उत्पादन को दोगुने करने की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए भारत जैसे कृषि प्रधान देशों को अभी से नये उपाय करने होंगे। हमारी कृषि व्यवस्था को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाने के अनेक उपाय हैं। जिन्हें अपनाकर कुछ हद तक कृषि पर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। साथ ही पर्यावरण मैत्री तरीकों का प्रयोग करके कृषि को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल किया जा सकता है। कुछ प्रमुख उपाय निम्न प्रकार हैं: वर्षा जल के उचित प्रबंधन द्वारा वातावरण के तापमान में वृद्धि के साथ साथ फसलों में सिंचाई की अधिक आवश्यकता पड़ती है। ऐसी स्थिति में जमीन का संरक्षण व वर्षा जल को एकत्रित करके सिंचाई हेतु प्रयोग में लाना एक उपयोगी कदम साबित हो सकता है। वाटर शेड प्रबंधन के माध्यम से हम वर्षा जल को संचित करके सिंचाई के रूप में उपयोग कर सकते हैं। इससे एक ओर हमें सिंचाई में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर भू-जल पुनर्भरण में भी सहायक सिद्ध होगा। जैविक एवं मिश्रित कृषि रासायनिक खेती से हरित गैसों में वृद्धि होती है जो वैश्विक तापन में सहायक होती हैं। इसके अलावा रासायनिक खाद व कीटनाशकों के प्रयोग से जहाँ एक ओर मृदा की उत्पादकता घटती है वहीं दूसरी ओर मानव स्वास्थ्य को भी भोजन के माध्यम से नुकसान पहुँचाती है। अतः इसलिए जैविक कृषि की तकनीकों पर अधिक जोर देना चाहिए। एकल कृषि के स्थान पर मिश्रित (समग्रित) कृषि लाभदायक होती है। मिश्रित कृषि में विविध फसलों का उत्पादन किया जाता है। जिससे उत्पादकता के साथ साथ जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने की संभावना नगण्य हो जाती है। फसल उत्पादन में नई तकनीकों का विकास जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को ध्यान में रखते हुए ऐसे बीज और नई किस्मों का विकास किया जाए जो नये मौसम के अनुकूल हो। हमें फसलों के प्रारूप तथा उनके बीज बोने के समय में भी परिवर्तन करना होगा। ऐसी किस्मों को विकसित करना होगा जो अधिक तापमान, सूखे तथा बाढ़ जैसी संकटमय परिस्थितियों को सहन करने में सक्षम हों। पारम्परिक ज्ञान तथा नई तकनीकों के समन्वयन और समावेशन द्वारा मिश्रित खेती तथा इंटरक्रोपिंग करके जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटा जा सकता है। जलवायु स्मार्ट कृषि (क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर) देश में जलवायु स्मार्ट कृषि (Climate smart Agriculture - CSA) विकसित करने की ठोस पहल की गयी है जिसके लिए राष्ट्रीय परियोजना भी लागू की गई है। दरअसल जलवायु स्मार्ट कृषि जलवायु परिवर्तन की तीन परस्पर चुनौतियों से निपटने की कोशिश करती है; उत्पादकता और आय बढाना, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होना तथा कम उत्सर्जन करने में योगदान करना। उदाहरण के लिए, यदि सिंचाई की बात करें तो जल के उचित इस्तेमाल के लिए सूक्ष्म सिंचाई (माइक्रो इरिगेशन) को लोकप्रिय बनाना। जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन होना यह दर्शाता है कृषि को जलवायु परिवर्तन सहन करने हेतु सक्षम बनाना। जलवायु परिवर्तन के अनुमानित प्रभावों से कृषि क्षेत्रों की पहचान करनी होगी। इसके साथ ही इस प्रकार नीतियों का माहौल तैयार करना जिससे स्थानीय व राष्ट्रीय संस्थानों तक सफल क्रियान्वयन हो भारत में सबसे पहले जलवायु परिवर्तन के प्रति स्वयं को अनुकूलित करने तथा सतत विकास मार्ग के द्वारा आर्थिक और पर्यावरणीय लक्ष्यों को एक साथ हासिल करने का प्रयास किया गया है। इसी से प्रेरित होकर प्रधानमन्त्री ने 2008 में जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना जारी की। जलवायु परिवर्तन पर निर्मित आठ राष्ट्रीय एक्शन प्लान में से एक(राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन) कृषि क्षेत्र पर भी केंद्रित है। राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन वर्ष 2008 में शुरू किया गया। यह मिशन ‘अनुकूलन’ पर आधारित है। इस मिशन द्वारा भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक प्रभावी एवं अनुकूल बनाने हेतु कार्यनीति बनाई गई। इस मिशन के उद्देश्यों में कुछ प्रमुख बातों पर ध्यान दिया गया है जैसे, कृषि से अधिक उत्पादन प्राप्त करना, टिकाऊ खेती पर जोर देना, प्राकृतिक जल-स्रोतों व मृदा संरक्षण पर ध्यान देना, फसल व क्षेत्रानुसार पोषक प्रबंधन करना, भूमि-जल गुणवत्ता बनाए रखना तथा शुष्क कृषि को बढ़ावा देना इत्यादि। इसके साथ ही वैकल्पिक कृषि पद्धति को भी अपनाया जाएगा और इसके तहत जोखिम प्रबंधन,कृषि संबंधी ज्ञान सूचना व प्रौद्योगिकी पर विशेष बल दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, मिशन को परम्परागत ज्ञान और अभ्यास प्रणालियों, सूचना प्रौद्योगिकी, भू-क्षेत्रीय और जैव प्रौद्योगिकियों के सम्मिलन व एकीकरण से सहायता मिलेगी। जलवायु अनुरूप कृषि पर राष्ट्रीय पहल यह राष्ट्रीय पहल, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) का एक नेटवर्क प्रोजेक्ट है जोकि फरवरी 2011 में आया था। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य रणनीतिक अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शन द्वारा जलवायु परिवर्तन एवं जलवायु सुभेद्यता के प्रति भारतीय कृषि की सहन क्षमता को बढ़ाना है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को उच्च प्राथमिकता पर रखा है।इसके प्रमुख बिन्दुओं में भारतीय कृषि (फसल, पशु इत्यादि) को जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति सक्षम बनाना, जलवायु सह्य कृषि अनुसंधान में लगे वैज्ञानिकों व दूसरे हितधारको की क्षमता का विकास करना तथा किसानों को वर्तमान जलवायु खतरे के अनुकूलन हेतु प्रौद्योगिकी पैकेज का प्रदर्शन कर दिखाने का उद्देश्य रखा गया है।
कार्बन डाइऑक्साइड गैस वैश्विक तापन में लगभग 60 प्रतिशत की भागीदारी करती है। कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि से व तापमान में वृद्धि से पेड़-पौधों तथा कृषि पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। पिछले 30-50 वर्षों के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगभग 450 पीपीएम (प्वाइंट्स पर मिलियन) तक पहुँच गयी है। हालांकि कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि कुछ फसलों जैसे गेहूं तथा चावल के लिए लाभदायक है क्योंकि ये प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को तीव्र करती है और वाष्पीकरण के द्वारा होने वाली हानियों को कम करती है। परन्तु इसके बावजूद कुछ मुख्य खाद्यान्न फसलों जैसे गेंहू की उपज में काफी गिरावट आई है जिसका कारण कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि ही है ।
जलवायु परिवर्तन के कारण कीटों और रोगाणुओं में वृद्धि होती है। गर्म जलवायु में कीट-पतंगों की प्रजनन क्षमता बढ़ जाती है जिससे कीटों की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है और इसका कृषि पर काफी दुष्प्रभाव पड़ता है। साथ ही कीटों और रोगाणुओं को नियंत्रित करने की कीटनाशकों का प्रयोग भी कहीं ना कहीं कृषि फसल के लिए नुकसानदायक ही होता है।हालांकि कुछ अधिक सूखा-सहिष्णु फसलों को जलवायु परिवर्तन से लाभ हुआ है। भारत में कृषि स्थिरता के साथ जलवायु कारकों के संबंध का आकलन किया गया हैं। परिणामों से मालूम चलता है,कि अधिकतम तापमान का कृषि स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा हैं। इसके अलावा यह पाया गया कि आर्थिक दक्षता, सामाजिक इक्विटी और जलवायु कारकों का कृषि स्थिरता के साथ एक गैर-रैखिक संबंध है। सुझाव में नीति निर्माताओं को आर्थिक विकास, सामाजिक विकास और पारिस्थितिक सुरक्षा को बढ़ाने के लिए एक एकीकृत नीति को केंद्रीकृत करना चाहिए।
साथ ही पर्यावरण मैत्री तरीकों का प्रयोग करके कृषि को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल किया जा सकता है। कुछ प्रमुख उपाय निम्न प्रकार हैं:वाटर शेड प्रबंधन के माध्यम से हम वर्षा जल को संचित करके सिंचाई के रूप में उपयोग कर सकते हैं। इससे एक ओर हमें सिंचाई में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर भू-जल पुनर्भरण में भी सहायक सिद्ध होगा।
वातावरण के तापमान में वृद्धि के साथ साथ फसलों में सिंचाई की अधिक आवश्यकता पड़ती है। ऐसी स्थिति में जमीन का संरक्षण व वर्षा जल को एकत्रित करके सिंचाई हेतु प्रयोग में लाना एक उपयोगी कदम साबित हो सकता है।  जलवायु परिवर्तन के अनुमानित प्रभावों से कृषि क्षेत्रों की पहचान करनी होगी। इसके साथ ही इस प्रकार नीतियों का माहौल तैयार करना जिससे स्थानीय व राष्ट्रीय संस्थानों तक सफल क्रियान्वयन हो भारत में सबसे पहले जलवायु परिवर्तन के प्रति स्वयं को अनुकूलित करने तथा सतत विकास मार्ग के द्वारा आर्थिक और पर्यावरणीय लक्ष्यों को एक साथ हासिल करने का प्रयास किया गया है। इसी से प्रेरित होकर प्रधानमन्त्री ने 2008 में जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना जारी की। जलवायु परिवर्तन पर निर्मित आठ राष्ट्रीय एक्शन प्लान में से एक(राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन) कृषि क्षेत्र पर भी केंद्रित है। राष्ट्रीय राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन वर्ष 2008 में शुरू किया गया। यह मिशन ‘अनुकूलन’ पर आधारित है। इस मिशन द्वारा भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक प्रभावी एवं अनुकूल बनाने हेतु कार्यनीति बनाई गई। इस मिशन के उद्देश्यों में कुछ प्रमुख बातों पर ध्यान दिया गया है जैसे, कृषि से अधिक उत्पादन प्राप्त करना, टिकाऊ खेती पर जोर देना, प्राकृतिक जल-स्रोतों व मृदा संरक्षण पर ध्यान देना, फसल व क्षेत्रानुसार पोषक प्रबंधन करना, भूमि-जल गुणवत्ता बनाए रखना तथा शुष्क कृषि को बढ़ावा देना इत्यादि। इसके साथ ही वैकल्पिक कृषि पद्धति को भी अपनाया जाएगा और इसके तहत जोखिम प्रबंधन,कृषि संबंधी ज्ञान सूचना व प्रौद्योगिकी पर विशेष बल दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, मिशन को परम्परागत ज्ञान और अभ्यास प्रणालियों, सूचना प्रौद्योगिकी, भू-क्षेत्रीय और जैव प्रौद्योगिकियों के सम्मिलन व एकीकरण से सहायता मिलेगी। जलवायु अनुरूप कृषि पर राष्ट्रीय पहल यह राष्ट्रीय पहल, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) का एक नेटवर्क प्रोजेक्ट है जोकि फरवरी 2011 में आया था। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य रणनीतिक अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शन द्वारा जलवायु परिवर्तन एवं जलवायु सुभेद्यता के प्रति भारतीय कृषि की सहन क्षमता को बढ़ाना है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को उच्च प्राथमिकता पर रखा है।इसके प्रमुख बिन्दुओं में भारतीय कृषि (फसल, पशु इत्यादि) को जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति सक्षम बनाना, जलवायु सह्य कृषि अनुसंधान में लगे वैज्ञानिकों व दूसरे हितधारको की क्षमता का विकास करना तथा किसानों को वर्तमान जलवायु खतरे के अनुकूलन हेतु प्रौद्योगिकी पैकेज का प्रदर्शन कर दिखाने का उद्देश्य रखा गया है।
जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को ध्यान में रखते हुए ऐसे बीज और नई किस्मों का विकास किया जाए जो नये मौसम के अनुकूल हो। हमें फसलों के प्रारूप तथा उनके बीज बोने के समय में भी परिवर्तन करना होगा। ऐसी किस्मों को विकसित करना होगा जो अधिक तापमान, सूखे तथा बाढ़ जैसी संकटमय परिस्थितियों को सहन करने में सक्षम हों। पारम्परिक ज्ञान तथा नई तकनीकों के समन्वयन और समावेशन द्वारा मिश्रित खेती तथा इंटरक्रोपिंग करके जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटा जा सकता है
देश में जलवायु स्मार्ट कृषि (Climate Smart Agriculture-CSA) विकसित करने की ठोस पहल की गयी है जिसके लिए राष्ट्रीय परियोजना भी लागू की गई है। दरअसल जलवायु स्मार्ट कृषि जलवायु परिवर्तन की तीन परस्पर चुनौतियों से निपटने की कोशिश करती है; उत्पादकता और आय बढाना, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होना तथा कम उत्सर्जन करने में योगदान करना। उदाहरण के लिए, यदि सिंचाई की बात करें तो जल के उचित इस्तेमाल के लिए सूक्ष्म सिंचाई (माइक्रो इरिगेशन) को लोकप्रिय बनाना। जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन होना यह दर्शाता है कृषि को जलवायु परिवर्तन सहन करने हेतु सक्षम बनाना। जलवायु परिवर्तन के अनुमानित प्रभावों से कृषि क्षेत्रों की पहचान करनी होगी। इसके साथ ही इस प्रकार नीतियों का माहौल तैयार करना जिससे स्थानीय व राष्ट्रीय संस्थानों तक सफल क्रियान्वयन होभारत में सबसे पहले जलवायु परिवर्तन के प्रति स्वयं को अनुकूलित करने तथा सतत विकास मार्ग के द्वारा आर्थिक और पर्यावरणीय लक्ष्यों को एक साथ हासिल करने का प्रयास किया गया है। इस मिशन के उद्देश्यों में कुछ प्रमुख बातों पर ध्यान दिया गया है जैसे, कृषि से अधिक उत्पादन प्राप्त करना, टिकाऊ खेती पर जोर देना, प्राकृतिक जल-स्रोतों व मृदा संरक्षण पर ध्यान देना, फसल व क्षेत्रानुसार पोषक प्रबंधन करना, भूमि-जल गुणवत्ता बनाए रखना तथा शुष्क कृषि को बढ़ावा देना इत्यादि। इसके साथ ही वैकल्पिक कृषि पद्धति को भी अपनाया जाएगा और इसके तहत जोखिम प्रबंधन,कृषि संबंधी ज्ञान सूचना व प्रौद्योगिकी पर विशेष बल दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, मिशन को परम्परागत ज्ञान और अभ्यास प्रणालियों, सूचना प्रौद्योगिकी, भू-क्षेत्रीय और जैव प्रौद्योगिकियों के सम्मिलन व एकीकरण से सहायता मिलेगी।
इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य रणनीतिक अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शन द्वारा जलवायु परिवर्तन एवं जलवायु सुभेद्यता के प्रति भारतीय कृषि की सहन क्षमता को बढ़ाना है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को उच्च प्राथमिकता पर रखा है।इसके प्रमुख बिन्दुओं में भारतीय कृषि (फसल, पशु इत्यादि) को जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति सक्षम बनाना, जलवायु सह्य कृषि अनुसंधान में लगे वैज्ञानिकों व दूसरे हितधारको की क्षमता का विकास करना तथा किसानों को वर्तमान जलवायु खतरे के अनुकूलन हेतु प्रौद्योगिकी पैकेज का प्रदर्शन कर दिखाने का उद्देश्य रखा गया है।जिन्हें अपनाकर कुछ हद तक कृषि पर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है।
रासायनिक खेती से हरित गैसों में वृद्धि होती है जो वैश्विक तापन में सहायक होती हैं। इसके अलावा रासायनिक खाद व कीटनाशकों के प्रयोग से जहाँ एक ओर मृदा की उत्पादकता घटती है वहीं दूसरी ओर मानव स्वास्थ्य को भी भोजन के माध्यम से नुकसान पहुँचाती है। अतः इसलिए जैविक कृषि की तकनीकों पर अधिक जोर देना चाहिए। एकल कृषि के स्थान पर मिश्रित (समग्रित) कृषि लाभदायक होती है। मिश्रित कृषि में विविध फसलों का उत्पादन किया जाता है। जिससे उत्पादकता के साथ साथ जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने की संभावना नगण्य हो जाती है।
जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को ध्यान में रखते हुए ऐसे बीज और नई किस्मों का विकास किया जाए जो नये मौसम के अनुकूल हो। हमें फसलों के प्रारूप तथा उनके बीज बोने के समय में भी परिवर्तन करना होगा। ऐसी किस्मों को विकसित करना होगा जो अधिक तापमान, सूखे तथा बाढ़ जैसी संकटमय परिस्थितियों को सहन करने में सक्षम हों। पारम्परिक ज्ञान तथा नई तकनीकों के समन्वयन और समावेशन द्वारा मिश्रित खेती तथा इंटरक्रोपिंग करके जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटा जा सकता है।  उत्पादकता और आय बढाना, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होना तथा कम उत्सर्जन करने में योगदान करना। उदाहरण के लिए, यदि सिंचाई की बात करें तो जल के उचित इस्तेमाल के लिए सूक्ष्म सिंचाई (माइक्रो इरिगेशन) को लोकप्रिय बनाना। जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन होना यह दर्शाता है कृषि को जलवायु परिवर्तन सहन करने हेतु सक्षम बनाना।
निष्कर्ष
उपर्युक्त अध्ययन से निष्कर्ष निकलता है, कि बढ़ते जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए घातक है। जलवायु परिवर्तन का  कृषि के साथ- साथ मानवीय जीवन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। ऊपर दिये गए सुझावों व तकनीकों को अपनाकर कृषि व्यवस्था को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है। भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूल और सक्षम बना सकते हैं। इस प्रकार कृषि को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचाने के सतत कृषि पद्धति अपननी होगी।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
  1. All India Report on Agriculture Census 2010-11, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, Government of India
  2. National Mission for Sustainable Agriculture (NMSA), Operational Guidelines 2014, Department of Agriculture & Cooperation Ministry of Agriculture Government of India
  3. Knowledge Paper Series; Sustainable Agriculture in Rajasthan, Government of Rajasthan
  4. Rajasthan Organic Farming Policy 2017, Government of Rajasthan
  5. State Focus Paper 2018-19 for Rajasthan by National Bank for Agriculture and Rural Development, Rajasthan Regional Office, Jaipur
  6. Strategy for Doubling Farmers' Income by 2022 by Ashok Dalwai Committee, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, Government of India
  7. https://www.skymetweather.com/content/agriculture-and-economy/dependency-of-indian agriculture-on-monsoon/#sthash.POIiy7s6.dpuf. economictimes.indiatimes.com/articleshow/50978336.cms?utm_source=contentofinterest&utm_m edium=text&utm_campaign=cppst