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कुँअर बेचैन के काव्य में सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना : एक युगबोध | |||||||
Socio-Cultural Consciousness in the Poetry of the Kunwar Bechain: Ek Yugbodh | |||||||
Paper Id :
15732 Submission Date :
2022-02-18 Acceptance Date :
2022-02-20 Publication Date :
2022-02-25
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सारांश |
किसी भी देश का साहित्य उस देश की संस्कृति एवं समाज का प्रतिबिम्ब माना जाता है । सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण और वैयक्तिक अनुभूतियों का वैज्ञानिक रीति से यथार्थ अध्ययन करने की क्षमता काव्य में पूर्ण निहित होती है । समाज सामाजिक संबंधों का एक जाल है और इस जाल की अभिव्यक्ति हमें विभिन्न प्रकार से देखने को मिलती है । समाज के साथ अंतःसंबंध होने के कारण ही व्यक्ति ’मानव’ कहलाने का अधिकारी हो पाता है। संस्कृति जीवन का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है जिसमें हम जन्म लेते हैं । इसलिए जिस समाज में हम पैदा हुए हैं अथवा जिस समाज में मिलकर हम जी रहे हैं, उसकी संस्कृति हमारी है, यद्यपि अपने जीवन में हम जो संस्कार संचित करते हैं वह हमारी संस्कृति का अंग बन जाते हैं और अंततः मरने के पश्चात् हम अन्य वस्तुओं के साथ अपनी संस्कृति की विरासत भी अपनी संतानों के लिए छोड़ जाते हैं । इसलिए संस्कृति एक ऐसा स्वरूप है जो हमारे सम्पूर्ण जीवन को आच्छादित किए हुए है तथा जिसकी रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है । यही नहीं संस्कृति हमारा पीछा जन्म-जन्मांतर तक करती रहती है ।
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सारांश का अंग्रेज़ी अनुवाद | Literature of any country is considered a reflection of the culture and society of that country. The ability to study the socio-cultural environment and personal experiences in a scientific manner is fully vested in poetry. Society is a web of social relations and we get to see the expression of this web in different ways. It is only because of the interrelationship with the society that a person is entitled to be called 'human'. Culture is a way of life and this way is accumulated over the centuries and remains in the society in which we are born. Therefore, the culture of the society in which we are born or the society in which we are living together is ours, although the values we accumulate in our lives become a part of our culture and eventually after we die we become part of other things. Along with this, they also leave the heritage of their culture for their children. Therefore, culture is such a form that covers our whole life and in its creation and development, the experience of many centuries has a hand. Not only this, culture keeps following us till birth after birth. | ||||||
मुख्य शब्द | समाज, संस्कृति, युगबोध, संस्कार, सामाजिकता, यथोचित, मानसिकता । | ||||||
मुख्य शब्द का अंग्रेज़ी अनुवाद | Society, Culture, Age, Culture, Sociality, Proper, Mentality. | ||||||
प्रस्तावना |
प्रायः समाज में जो जो घटित हो रहा होता है, वही लेखनी रच देती है और वही रचना का स्वरूप धारण कर लेती है । इस संदर्भ में कुँअर बेचैन जी ने अपनी लेखनी से सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के युगबोध का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है, जो कि देखते ही बनता है ।
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अध्ययन का उद्देश्य | साहित्य समाज का दर्पण होता है, इसमें कोई दोराय नहीं होनी चाहिए, क्योंकि समाज में जो घटित हो रहा होता है उसे कवि अपनी लेखनी के द्वारा एक नया आयाम एवं विस्तृत रूप प्रदान करता है । कविवर बेचैनजी ने अपनी लेखनी से सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का बड़ा ही गंभीर एवं सरस-सुंदर रूप प्रस्तुत किया है । पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध में सामाजिक संबंधों में निरंतर खटास पैदा हो रही है तथा भारतीय संस्कृति को धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है । आचरण की पवित्रता से लोग फिसलते जा रहे हैं । भौतिक सभ्यता एवं बाहृय आडंबर लोगों को चारो तरफ से जकड़े हुए है । ऐसी विषम स्थितियों में लोगों को धैर्य एवं विवेक का संबल प्रदान करना तथा परिस्थितयों से निजात दिलाना ही कवि का मुख्य उद्देश्य रहा है । |
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साहित्यावलोकन | विश्वस्तरीय शोध-पत्रिका ’शोध दिशा’ यू.जी.सी. द्वारा मान्यता प्राप्त एक अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक शोध पत्रिका के जुलाई-सितम्बर 2021 के अंक में डा0 अशोक कुमार ने शोध आलेख ’भारतीय संस्कृति एवं साहित्य का अंतरसंबंध’ पर काव्य में सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया है ।
संस्कृति वस्तुतः एक ऐसा साधन है, जो मनुष्य को उच्चतम नैतिक शिक्षा तक ले जाती है । संस्कृति ही वह दर्पण है जिसमें समाज अथवा राष्ट्र के सभी आयाम नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि प्रतिबिंबित होते हैं ।
भारतीय संस्कृति की मुख्य विशेषता यह है कि वह अपनी परंपराओं का निरीक्षण कर उनमें से संशोधन-परिवर्तन करती रहती है और वह सम्पर्क में आने वाली किसी भी संस्कृति को अपने में समाहित करने में सक्षम रही है । आधुनिक युग में भारतीय संस्कृति में अनेक नए तत्व जुड़े हैं । [24] |
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मुख्य पाठ |
सामाजिक मूल्यों में गिरावट साँसों के पीछे बैठे हैं, नए-नए खतरे, जैसे लगे जेब के पीछे, कई जेबकतरे मेरी दुआएँ उनकी दुआओं के साथ हैं बहुत आसान है पत्थर को फेंका जाना काश तख्ती बेजान न होती, तो वह दहाड़-दहाड़ कर
कहती उसमें निहित अभिव्यक्ति की नवीन कलात्मक भंगिमा। आज के व्यक्ति का दृष्टिकोण केवल अपने तक ही सीमित रह गया
है। यदि स्वयं को दुःख हो तो सभी को बताया-जताया जाता है लेकिन वहीं जब दूसरों का
दुःख सुनना पड़ता है तो वह कथा बन जाती है। इस संदर्भ में बेचैनजी कहते हैं - बात मेरी चली तो व्यथा बन गयी
होटल-जिसके दरवाजे हैं, बड़े सजे सँवरे मीठापन जो लाया था मैं गाँव से, कुछ दिन शहर रहा अब अनाम जंजीरों ने आ जकड़ी है [7]
संबंधों को पढ़ती है, केवल व्यापारिकता ईमान भी इंसान का साथी नहीं रहा, करता है शोर शोक-सभाओं में कहकहा ’पास बुक’ पर तो नजर है कि कहाँ
रक्खी है
ओ पिता! तुम दीप हो घर के, और सूरज-चाँद अंबर
के ! माँ की साँस पिता की खाँसी सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं ऐसी माँ से ऐ ’कुँअर’ तुम भी तो मिले होगे पूछा कि कौन दुनियाँ में सबसे गरीब है बेटी भी वंश की बेल बढ़ावै, दो-दो कुटुम्बों का
नाम चलावै मिलना और बिछुड़ना, दोनों जीवन की
मजबूरी है बेटियाँ-शीतल हवाएँ हैं जो पिता के घर, बहुत दिन तक नहीं रहतीं। जो जनक के घर उतरती है, रोज शिव का ध्यान
धरती है अब के बरस राखी भेज न पाई वो किसी भी जाति की हों, या किसी मजहब की हों तू ही गीता,तू ही रामायण, तू कुरान की आयत, तू ही कर्मभूमि जीवन
की, तू ही उसकी किस्मत आओ मिलकर अब हम एक ऐसा मौसम तैयार करें फकीरी में है बादशाहत हमारी
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निष्कर्ष |
अन्ततः यह कहा जा सकता है कि देश की सभ्यता और संस्कृति बचाने के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को समभाव से कार्य करना होगा तथा आपसी प्रेम एवं सौहार्द को कायम रखते हुए विकास की ओर अग्रसर रहना होगा । कुँअर बेचैनजी का मानना है कि हम सभी को एकत्रित्र होकर अन्याय के खिलाफ जंग जारी रखनी होगी । इसी में हम सबका तथा राष्ट्र का कल्याण निहित है । |
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सन्दर्भ ग्रन्थ सूची | 1. पिन बहुत सारे - कुँअर बेचैन, पृ0सं013
2. आँगन की अलगनी-कुँअर बेचैन, पृ0सं044
3. नदी, तुम रूक क्यो र्गइं-कुँअर बेचैन, पृ0सं027
4. शब्दः एक लालटेन-कुँअर बेचैन, पु0सं078-79
5. उर्वशी हो तुम-कुँअर बेचैन, पृ0सं043
6. पिन बहुत सारे-कुँअर बेचैन, पृ0सं031
7. भीतर साँकलः बाहर साँकल-कुँअर बेचैन, पृ0सं013
8. वही, पृ0सं014
9. वही, पृ0सं066
10. कोई आवाज देता है-कुँअर बेचैन, पृ0सं053
11. झुलसो मत मोर-पंख-कुँअर बेचैन, पृ0सं0 29
12. वही, पृ0सं038
13. आँधियों में पेड़-कुँअर बेचैन, पृ0सं037
14. ....तो सुबह हो-कुँअर बेचैन, पृ0सं018
15. दिन दिवंगत हुए-कुँअर बेचैन, पृ0सं0108
16. वही, पृ0सं099
17. झुलसो मत मोर-पंख-कुँअर बेचैन, पृ0सं066
18. वही, पृ0सं039
19. उर्वशी हो तुम-कुँअर बेचैन, पृ0सं080
20. आग पर कंदील-कुँअर बेचैन, पृ0सं073
21. नदी पसीने की-कुँअर बेचैन, पृ0सं037
22. वही, पृ0सं053
23. महावर इंतजारों का-कुँअर बेचैन, पृ0सं043
24. विश्व स्तरीय शोधपत्रिका ’शोध दिशा’ ’भारतीय संस्कृति एवं साहित्य का अंतरसंबंध’- डा0 अशोक कुमार, जुलाई-सितम्बर 2021 |